➤ हिमाचल में भांग-अफीम की अवैध खेती पर नकेल कसने के लिए एनसीबी की हाईटेक पहल
➤ पहाड़ों के चप्पे-चप्पे की होगी जियो टैगिंग, जीपीएस, फोटो और वीडियो से तैयार होगा डिजिटल डोजियर
➤ पारदर्शिता के लिए पहली बार वन विभाग जारी करेगा अवैध फसल नष्ट करने का आधिकारिक प्रमाणपत्र
हिमाचल प्रदेश की दुर्गम वादियों और ऊंचे पहाड़ों की आड़ में फलने-फूलने वाले नशे के काले कारोबार पर अब तकनीक का ऐसा चक्रव्यूह कसने जा रहा है, जिससे बच निकलना तस्करों के लिए नामुमकिन होगा। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने देवभूमि में भांग और अफीम की अवैध खेती को जड़ से उखाड़ने के लिए अत्याधुनिक जियो टैगिंग प्रणाली को जमीन पर उतार दिया है। अब पहाड़ों में छिपे हर उस कोने की सटीक कुंडली तैयार होगी जहां नशे की पौध रोपी जाती है। इसके तहत अवैध खेती वाले प्रत्येक चिह्नित स्थान की सटीक लोकेशन जीपीएस के जरिए दर्ज की जाएगी, जिसमें उस जगह का अक्षांश और देशांतर रिकॉर्ड किया जाएगा। इसके साथ ही मौके की उच्च गुणवत्ता वाली फोटो और वीडियो भी डिजिटल रिकॉर्ड का अहम हिस्सा बनाई जा रही हैं, ताकि अदालत में पक्के डिजिटल साक्ष्य पेश किए जा सकें।
इस डिजिटल पहरेदारी का सबसे बड़ा वार पुराने नशा माफिया पर होगा। अक्सर देखा जाता था कि सरकारी टीमें जिस दुर्गम पहाड़ी से फसल काटकर लौटती थीं, वहां अगली ऋतु में फिर से नशे की हरियाली लहलहा उठती थी। मगर अब यह खेल पूरी तरह बंद होने जा रहा है। जियो टैगिंग का डिजिटल डोजियर यह सुनिश्चित करेगा कि जिन जगहों पर पहले कभी भी कार्रवाई हुई है, उनकी डिजिटल निगरानी लगातार बनी रहे। यदि किसी नष्ट किए गए खेत में दोबारा भांग या अफीम उगाने की हिमाकत की गई, तो जांच एजेंसियां पुराने जीपीएस रिकॉर्ड, तस्वीरों और वीडियो के जरिए तुरंत अपराध साबित कर देंगी। इस डेटाबेस में यह भी साफ दर्ज रहेगा कि किस तारीख को किस जमीन से कितनी अवैध फसल नष्ट की गई थी।
विशेष रूप से कुल्लू की पार्वती घाटी समेत हिमाचल प्रदेश के उन तमाम अति-दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों पर एनसीबी का कड़ा फोकस है, जहां पहुंचना आम तौर पर बेहद चुनौतीपूर्ण रहता है। इस डिजिटल डेटा के जरिए जमीन के असली मालिकों और गुपचुप काश्तकारी करने वालों की पहचान कर उन पर शिकंजा कसना बेहद आसान हो जाएगा। इस पूरे अभियान को अभेद्य बनाने के लिए पुलिस, वन विभाग और एनसीबी मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों में मजबूत और अकाट्य डिजिटल सबूत पेश किए जा सकेंगे। आने वाले दिनों में इस योजना को प्रदेश के अन्य संवेदनशील जिलों में भी विस्तार दिया जाएगा।
कार्रवाई में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सिस्टम में एक ऐतिहासिक बदलाव भी किया गया है। अब पहली बार वन विभाग फसल नष्ट करने का प्रमाणपत्र जारी करेगा। मौके पर नष्ट की गई फसल का डिजिटल रिकॉर्ड, जीपीएस कोऑर्डिनेट्स और फोटो-वीडियो के साथ बारीकी से मिलान किया जाएगा, जिसके बाद ही यह आधिकारिक सर्टिफिकेट जारी होगा। इससे फर्जी दावों पर पूरी तरह लगाम लगेगी और यह पुख्ता होगा कि जमीन पर वास्तव में नशे की फसल का नामोनिशान मिटा दिया गया है। तकनीक और प्रशासनिक तालमेल का यह नया संगम हिमाचल के पहाड़ों को नशे के जाल से मुक्त कराने में मील का पत्थर साबित होने वाला है।



